अमीर खुसरो (1253 - 1325) ने तेरहवीं शताब्दी में प्राचीन प्ररम्परा से चली आ रही प्रहेलिका (संस्कृत, जिसका अर्थ है 'पहेली') को उस समय की जन भाषा (खड़ी बोली) में ढालकर आम जनता के मनोरंजन और परोक्ष रूप से ज्ञानवर्धन के लिये अनेक पहेलियों कि रचना की. यह पहेलियाँ आम जनजीवन के इतने करीब थीं और जनमानस के बीच इस तरह रच-बस गयीं कि कुछ तो आज भी अपने मूल रूप में प्रचलित हैं.
संस्कृत काव्य परंपरा में प्रहेलिका का महत्वपूर्ण स्थान है. दण्डी ने
'काव्यादर्श' में सोलह प्रकार की प्रहेलिकाओं का उल्लेख किया है. पर संस्कृत काव्य परंपरा में भी दो तरह की पहेलिओं का अधिक प्रचलन था - 'शाब्दी' और 'अर्थ प्रधान', यानी पहेली का उत्तर या तो शब्द प्रधान होता है या फिर पहेली में दिये संकेतों से उसका अर्थ खोजना पड़ता है.
खुसरो ने इसी परंपरा में दो तरह की पहेलियों की रचना की - बूझ पहेलियाँ (शब्द के आधार पर उत्तर ढूँढना) और बिन-बूझ पहेलियाँ (संकेतों के आधार पर उत्तर ढूँढना).
'बूझ' पहेली में पहेली का उत्तर किसी-न-किसी प्रकार पहेली में ही छिपा रहता है. उदहारण के लिये -
बीसों का सिर काट दिया,
ना मारा ना खून किया
यदि आप 'ना' और 'खून' को एक साथ पढ़े या लिखें तो आपको इसका उत्तर मिल जायेगा.
इसी तरह 'बिन-बूझ' पहेलियों में पहेली में दिये संकेतों के आधार पर उत्तर को ढूंढना पड़ता है. उदहारण के लिये -
जल कर बने, जल में रहे
आँखों देखा खुसरो कहे
इसका उत्तर 'काजल' है.
खुसरो ने जो खुद देखा है (आँखों से) उसके बारे में पूछ रहे हैं. क्या आपने कभी काजल बनते देखा है? एक जलते हुए दिये पर मिट्टी के बर्तन को यदि हम औंधा रख दें तो औंधे रखे बर्तन पर कालिख जमा हो जाती है. इसी कालिख को ठंडा होने पर निकल कर अलग रख दिया जाता है. और काजल लगाते कहाँ हैं? आखों में? आँखों के ऊपरी भाग में पानी की परत जैसी होती है. यहाँ तीन संकेत थे - यह वस्तु ऐसी है जो जल कर बनती है, पानी में रहती है और खुसरो ने बड़ी कुशलता से आँख की तरफ इशारा भी कर दिया!
शब्दों की कितनी कुशल कारीगरी - शब्दों का जाल भी, पहेली में छिपा हुआ प्रश्न भी, कविता भी, दिमागी कसरत भी और पूरा मनोरंजन!
तो चलिए, पहले खुसरो की 'बूझ' पहेलियों के साथ माथापच्ची करते हैं. इन पहेलियों का अर्थ बूझो तो जानें...
खुसरो की बूझ पहेलियों
१) गोल मटोल और छोटा मोटा, हर दम वह ज़मीन पर लोटा
खुसरो कहे नहीं है झूठा, जो न बुझे अक्ल का खोटा
२) फारसी बोली आईना, तुर्की ढूंढी पाई ना
हिंदी बोली आरसी आये, खुसरो कहे कोई ना बताये
३) बाला था तब सबको भाया, बड़ा हुआ कुछ काम ना आया
खुसरो कह दिया उसका नाव, अर्थ बिचारो, नहि छोड़ो गाँव
४) चार महीने बहुत चालत है, और महीने थोरी
अमीर खुसरो यों कहे, तू बूझ पहेली मोरी
५) हाड़ की देहि, उज्जवल रंग, लिपटा रहे सबके संग
चोरी की, ना खून किया, वाका (उसका) सिर क्यों काट लिया
६) जल-जल चलता बसता गाँव, बस्ती में नावा का ठांव
खुसरो ने दिया वाका नांव, बूझो अर्थ नहि छोड़ो गाँव
७) एक नार तरु वर से उतारी, सर पर वाके पाँव
ऐसी नार कुनार को मैं ना देखन जांव
८) अन्दर है और बाहर बहे
जो देखे सो मोरी कहे
९) श्याम वरन और दांत अनेक, लचकत जैसे नारी
दोनों हाथ खुसरो खीचे और तू कहे आ री
१०) श्याम बरन कि है नारी, माथे ऊपर लगे है प्यारी
जो मानस इस अर्थ को खोले, कुत्ते के वह बोली बोले
इस बार इन पहेलियों का उत्तर नहीं दिया जा रहा है. बहुत सरल पहेलियाँ हैं. उत्तर इन पहेलियों में ही छिपा है और आपको खुद इन्हें बूझना है.
साथ ही आप सब पाठकों से गुजारिश है कि यदि आपकी निगाह में खुसरो की बूझ औद बिन-बूझ पहेलियों के मौलिक उदहारण हों तो हमें ज़रूर
bujhotojaane@gmail.com पर लिख भेजें. हम उन्हें सहर्ष आपके नाम सहित
बूझो तो जानें पर प्रकाशित करेंगे.
अगले पोस्ट में हम आमिर खुसरो की कुछ बिन-बूझ पहेलियों आपके लिये लेकर आयेंगे.
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