रविवार, 21 दिसंबर 2014

कह-मुकरी - १



कह-मुकरी - १

कह-मुकरी (kah-mukrī) का अर्थ है कुछ कहकर उससे मुकर जाना। 

कह-मुकरी मूलतः दो सखियों के बीच संवाद है. पारम्परिक छंदों की तरह, पहले तीन पदों में एक सखी अपने प्रियतम (साजन) को याद करती जान पड़ती है. जब चौथे पद में उसकी सखी उसके कथनों से 'साजन' अभिप्राय लगाती है, तब पहली सखी अपनी बात से मुकर जाती है और पहले तीन पदों में कही अपनी बातों का कुछ और ही अर्थ बताती है. वह बहुत चालाकी से किसी और सामान्य वस्तु की ओर इशारा कर देती है. 

कह-मुकरी के प्रणेता अमीर खुसरो हैं. उनका कमाल इस कह-मुकरी में देखिये:


देखन मे वह गाँठ गठीला। चाखन में वो अधिक रसीला।
मुख चूमूँ तो रस का भांडा। 'क्यों सखि, साजन?' 'ना, सखि, गांडा'।। 

मूलतः, कह-मुकरी के प्रथम तीन पदों के दो अर्थ (double entendre) होते हैं. एक अर्थ में तो स्पष्ट तौर से एक सखी अपने अनुपस्थित प्रियतम/साजन को याद करती या अपने साजन के बारे में कहती हुई दीखती है, पर वह यह बात अपनी सखी के सामने कैसे स्वीकार करे? इसलिए अपनी सखी के 'साजन' पूछने पर वह मुकर जाती है. इस कह-मुकरी में भी वह कर तो अपने साजन की बात रही  है, पर अपने सखी के 'साजन' कहने पर ईख/गन्ने (sugarcane) की ओर इशारा कर देती है. बिना कहे रहा भी न जाय और कहकर भी न कहे, यही कह-मुकरी की विशेषता है. 

परवर्ती काल में  जन-मानस में कह-मुकरी बहुत ही लोकप्रिय हो गयी और इसने पहेली का रूप भी धारण कर लिया. जैसेकि:


सगरि रैन वह मो संग जागा। भोर भई तब बिछुरन लागा। 
वाके बिछरत फाटे हिया। 'क्यों सखि, साजन?' 'ना, सखि, .......' ।।

 एक ओर तो पहले तीन पदों से 'साजन' तो समझ में आता है, पर इसका एक अर्थ और है जो साजन से एकदम भिन्न है. ज़रा, बूझो तो जानें … 

क्या? नहीं बूझ पाये? चलिए इस बार आपको बता देते हैं … 

खाली स्थान का शब्द 'दिया' है! सारी रात वह मेरे संग जगा है. सुबह होते ही वह मुझसे बिछड़ने लगा और उसके बिछड़ते ही मेरा कलेजा फटने लगा. यहाँ आखरी पद का अर्थ पौ फटने से भी है. जहाँ पहले तीन पद रात को साजन के साथ की बात कहता है वहीँ यह तीन पद रात के समय दिये के विशेषता भी बताता है.  


अमीर खुसरो द्वारा विकसित इस काव्य परंपरा को आधुनिक काल में खड़ी बोली हिंदी के उद्भव समय में भारतेंदु हरिश्चंद्र (१८५०-१८८५) ने इस विधा भरपूर उपयोग किया. पराधीनता के समय भारतियों को प्रेरित करने एवं अंग्रेज़ों के सेंसरशिप के दौर में भी अपने कथन को कहने के लिए भारतेंदु ने कई कह-मुकरियों की रचना की. उदहारण के लिए भारतेंदु की यह कह-मुकरी तो देखिये: 



भीतर भीतर सब रस चूसै ।
हँसि हँसि कै तन मन धन मूसै ।।
जाहिर बातन मैं अति तेज ।
क्यों सखि सज्जन नहिं अँगरेज ।।

निश्चित ही भारतेंदु की कह-मुकरियों खुसरो से बहुत अलग है. समय के अनुसार, साजन सज्जन में परिवर्तित हो गया, पर अपनी कथन को कहने का अभिप्राय वही है. आज हिंदी/उर्दू में कह-मुकरियों का रिवाज़ एकदम खत्म-सा है. पर हमारे पास खुसरो और भारतेंदु की कह-मुकरियाँ तो हैं!
 


अगले कुछ पोस्ट में बूझो तो जानें अमीर खुसरो और भारतेंदु हरिश्चनद्र की कुछ कह-मुकरी आपे लिए पेश करेगा. फिर अमीर खुसरो की पांच कह-मुकरियाँ लेकर आएगा, पर बिना उत्तर के. बूझो तो जानें की सखी बनकर इन्हें आपको बूझना है. सही बूझने का इनाम है संजय रावत द्वारा लिखी गयी 'पहेली बूझो और बनाओ' है . 

तो, बूझो तो जानें पर आते रहिये - अपनी लोकसंस्कृति की धरोहर जानने के लिए और साथ ही दिमागी कसरत के लिए …                  



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