क्यों?
सोहनलाल द्विवेदी
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| (राष्ट्रकवि सोहनलाल द्विवेदी का चित्र www.ajabgajab.com के सौजन्य से) |
सोहनलाल द्विवेदी (४ मार्च १९०६ - १ मार्च १९८८) ने हिन्दी साहित्य में राष्ट्रीय चेतना के गायक कवि के रूप में इतनी ख्याति पाई कि उन्हें 'राष्ट्रकवि' के रूप में जाना जाने लगा। इसके साथ ही वे बालकाव्य के अप्रतिम रचनाकार भी हैं।
'वंदना के इन स्वरों में, एक स्वर मेरा मिला लो' पूजा गीत, से 'भारतवर्ष', 'युगावतार गाँधी', 'राणा प्रताप के प्रति', 'बढ़े चलो! बढ़े चलो!', 'सुना रहा हूँ तुम्हें भैरवी' इत्यादि न जाने उनकी कितनी कविताएँ आज भी पाठकों के मन में वही भावनाएँ जागृत करती हैं, जिस भाव का संचार शायद प्रथम प्रकाशन के समय हुआ होगा।
परन्तु, द्विवेदी जी ने अपनी कवि-यात्रा का आरम्भ बालगीतों से किया था। उनकी प्रथम बाल कविता 'बिलैया' शिशु पत्रिका के जून १९२९ अंक में छपी थी। तब से अपने जीवन के अंतिम दिनों तक उन्होंने सैकड़ों कविताएँ लिखीं जो
अधिकांशतः उनकी १९ कृतियों एवं २४ बालगीत-संग्रहों में प्रकाशित हुई हैं।
आज हम बाल-सखा पत्रिका के वर्ष - २३; अंक - ८ (अगस्त १९३९; श्रावण १९९६) में प्रथम प्रकशित
उनकी कविता 'क्यों?' को आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहे हैं।
'क्यों?' कविता में बच्चों के मन में आने वाले प्रश्न, उनकी नैसर्गिक कुतूहल और बालपन की सादगी का समावेश है। द्विवेदी जी ने इन्हें प्रश्नों का रूप देकर ग्यारह प्रश्न-पहेलियाँ तैयार की हैं, जिनका उत्तर इन कविताओं में है भी और नहीं भी! बाल्य काल के इन मनोभावों की गुत्थी का सही उत्तर कौन दे पायेगा? द्विवेदी जी के शब्दों में कहें तो, "सुलझाये यह कौन पहेली?"
यह पहली बार हो रहा है कि बूझो तो जानें हम कविता उद्धृत कर रहे हैं? सोहनलाल द्विवेदी जी की यह बालकविता 'क्यों?' बूझो तो जानें पर नई-पुरानी पहेलियों के संचयन का जो प्रयास हम कर रहे हैं, उसे संवर्धित करने में एक महत्त्वपूर्ण कड़ी है। आशा है कि पहेली-प्रेमियों, कविता-प्रेमियों और अभिभावकों को 'क्यों?' उतनी ही अच्छी लगेगी, जितना हमें इसे ढूँढ़ने में मिली है।
आइये, इस भूली-बिसरी कविता का आनन्द लेते हैं . . .
।। १ ।।
क्यों बच्चों को नहीं सुहाता,
पढ़ना-लिखना, शाला जाना?
खेल-कूद में मन लगता,
दिन भर घर में धूम मचाना?
क्यों भाती मन को रंगरेली?
सुलझाये यह कौन पहेली?
।। २ ।।
क्यों पतंग उड़ती है ऊपर?
क्यों न कभी नीचे को आती?
और गेंद फेंको जो ऊपर,
तो वह फौरन नीचे आती,
चोट लगाते ठेला-ठेली,
सुलझाये यह कौन पहेली?
।। ३ ।।
क्यों मेंढक पानी में रहते?
टर्रटों-टर्रटों गाना गाते,
क्यों न घोंसले में चढ़कर के
वे चिड़ियों को मार भागते?
जल में ही करते अठखेली,
सुलझाये यह कौन पहेली?
।। ४ ।।
क्यों कोल्हू जब बैल चलाता,
उसकी आँख बन्द की जाती?
तिल में से न कढ़ता है,
कितनी ही वह पेरी जाती,
कब मन में खुश होता तेली?
सुलझाये यह कौन पहेली?
।। ५ ।।
क्यों स्याही होती है काली?
क्यों काला कागज न दिखाता
रंग-बिरंगी तस्वीरें लाख,
हरा-भरा मन है बन जाता,
क्यों भाते हैं सखा-सहेली?
सुलझाये यह कौन पहेली?
।। ६ ।।
नहीं मदरसे अच्छे लगते,
भाता है छुट्टी का घण्टा।
मजा न चुप रहने में मिलता,
मजा तभी जब बजता टंटा।
अच्छी लगती ठेलमठेली।
सुलझाये यह कौन पहेली?
।। ७ ।।
चाचाजी क्यों दाढ़ी रखते,
बच्चों के मूँछें न दिखतीं?
क्यों चची कंघी करती है,
अम्माँ अंजन रोज लगाती?
गुरु को भाते चेला-चेली,
सुलझाये यह कौन पहेली?
।। ८ ।।
क्यों चींटी बिल में रहती है,
क्यों इनको है शक्कर भाती,
पानी में शक्कर डालो तो,
पल भर में वह घुल-मिल जाती,
चींटी को भाती गुड़ भेली,
सुलझाये यह कौन पहेली?
।। ९ ।।
क्यों नटखट बच्चों को भाता
सदा पहेली को सुलझाना,
क्यों नानी को अच्छा लगता,
बच्चों के मन को उलझाना,
क्यों भाती है कथा-नवेली,
सुलझाये यह कौन पहेली?
।। १० ।।
सम्पादक जी को क्यों भाता,
बच्चों के मन को छलना?
क्यों बच्चों को अच्छा लगता,
सम्पादक का मन फुसलाना,
छिड़ती छेड़छाड़ अलबेली,
सुलझाये यह कौन पहेली?
।। ११ ।।
क्यों मुझको अच्छा लगता है,
नई-नई नित कविता गढ़ना?
क्यों तुमको अच्छा लगता है,
नई-नई नित कविता पढ़ना?
क्यों भाता है फूल चमेली,
सुलझाये यह कौन पहेली?
।। इति ।।
यदि आपको ऐसी ही कविताओं की जानकारी हो, या ऐसी ही कविता आपने भी लिखी हों, तो हमें bujhotojaane@gmail.com पर लिख भेजें। उन्हें आपके नाम से प्रकाशित कर हमें बहुत आनन्द होगा।
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